कहानी की शुरुआत:
आठ दोस्तों का एक ग्रुप, गर्मी की छुट्टियाँ बिताने के लिए "कालवन" नाम के घने जंगल की ओर निकलता है। उनका इरादा था वहाँ एक हफ्ता बिताना, कैंप लगाना, और सूरज के यूट्यूब चैनल के लिए वीडियो शूट करना।
गाँव के बुज़ुर्गों ने उन्हें मना किया – "उस जंगल में रात मत बिताना... वहाँ कुछ है जो इंसानों का शिकार करता है।"
पर अंशुल ने सबको समझाया – “डरना नहीं है, ये सब कहानियाँ हैं। जंगल में शेर, भालू हो सकते हैं, मगर हम सब तैयार हैं।”
पहली रात:
पहली रात कैंप फायर के पास सब मस्ती करते हैं। सूरज वीडियो रिकॉर्ड करता है। अचानक दूर से किसी जानवर की अजीब सी दहाड़ सुनाई देती है – न शेर, न भेड़िया, कुछ और…
दीपक ने कहा, “ये आवाज़ मैंने पहले कभी नहीं सुनी। ये किसी खतरनाक जानवर की है।”
पर सब ने हँसी में टाल दिया।
दूसरी रात:
रात को नंदिनी अचानक चीख उठती है। सब दौड़कर उसके टेंट में जाते हैं। वो काँप रही थी – “मेरे टेंट के बाहर कुछ था... लाल आँखें... बहुत बड़ी परछाई...”
दीपक और रवि टॉर्च लेकर बाहर जाते हैं। कुछ नहीं मिलता... पर एक बात साफ़ थी – पेड़ों की छाल खरोंची हुई थी, और ज़मीन पर गहरे पंजों के निशान थे – इंसानी पैर से चार गुना बड़े।
तीसरी रात:
करण गायब हो जाता है। सब इधर-उधर ढूंढते हैं। कुछ दूर झाड़ियों में उसका फटा हुआ टी-शर्ट और खून से सना कैमरा मिलता है।
अब डर सबके चेहरे पर साफ़ था। सूरज ने वीडियो बनाना बंद कर दिया। अंशुल को भी अपनी जिद पर पछतावा होने लगा।
दीपक की योजना:
दीपक कहता है, “ये कोई सामान्य जानवर नहीं है। शायद ये वही है जिसके बारे में गाँव वाले बोलते थे। हमें आग के घेरे में रहना होगा और सुबह होते ही वापस निकल जाना होगा।”
पर अगली रात और भयानक होती है...
अब बारी थी रवि की। जब सब सो रहे थे, वो टॉयलेट के लिए बाहर गया और फिर कभी वापस नहीं आया। अगली सुबह उसका सिर पेड़ पर लटकता मिला... चेहरे पर डर और खून जमी हुई थी।
अब बचे थे सिर्फ छह:
प्रिया, नंदिनी और श्रेया घबराने लगीं। अंशुल को गुस्सा आने लगा – “हम लड़ेंगे! हम भागेंगे नहीं!”
दीपक ने मना किया – “तू लड़ नहीं सकता, ये जानवर नहीं, कोई राक्षस है।”
सच सामने आता है:
नंदिनी चुपचाप एक बात बताती है – “मेरी दादी कहा करती थी, कालवन में एक ‘ख़ूनख़ार वनबिलास’ है – न आधा जानवर, न पूरा इंसान। उसे इंसानी मांस की आदत पड़ चुकी है। जो रात में जंगल में शोर करता है, उसे वो सबसे पहले उठाता है।”
सबके होश उड़ जाते हैं। तभी अंधेरा घिरने लगता है...
अंतिम युद्ध:
दीपक, अंशुल और श्रेया मिलकर एक जाल बनाते हैं। जगह-जगह भाले और आग के घेरे तैयार करते हैं। सूरज कैमरा ऑन करता है – “अगर हम नहीं बचे, तो दुनिया को पता चले कि ये सच था।”
रात को एक बार फिर वही लाल आँखें दिखती हैं। लंबा, झुका हुआ शरीर, खून से सने नाखून, और दहाड़ से काँपती ज़मीन...
जाल फँसता है... आग की लपटें उसे घेरती हैं... एक डरावनी चीख़ गूंजती है और वो प्राणी आग में जलकर राख हो जाता है।
सुबह:
केवल पांच लोग ज़िंदा बचते हैं – अंशुल, दीपक, सूरज, प्रिया और नंदिनी। वे जंगल से बाहर निकलते हैं।
सूरज का कैमरा अब भी रिकॉर्ड कर रहा था... लेकिन अंतिम फ्रेम में जंगल की झाड़ियों के पीछे फिर से वही दो लाल आँखें झलकती हैं...
“कालवन का शिकारी… अभी मरा नहीं है…”
