Sritunjay World: सीमा के उस पार अंतिम प्रहार

सीमा के उस पार अंतिम प्रहार

 


"सीमा के उस पार: अंतिम प्रहार"

(कहानी शुरू की जा रही है — यह लंबी होगी और पूरी तरह आपकी माँग के अनुसार भावनाओं से भरी होगी।)





"सीमा के उस पार: अंतिम प्रहार"


रात के ढाई बजे का वक़्त था। कश्मीर की बर्फीली चोटियों पर गहराई से सन्नाटा पसरा हुआ था। दूर से सिर्फ़ बर्फ़ की दरारें और बर्फीली हवाओं की सीटी सुनाई दे रही थी। मगर इसी सन्नाटे में छिपी थी एक चिंगारी — भारत की विशेष कमांडो यूनिट "वज्र 9"।


कमांडो अर्णव राठी अपने यूनिट के साथ बर्फ़ में घुटनों तक धंसे खड़े थे। चेहरे पर काली पट्टी, आँखों में वह तेज़ जो दुश्मन की साँसों में भी डर घोल दे। इस ऑपरेशन का नाम था "शून्य"  एक ऐसा मिशन जिसका उद्देश्य था पाकिस्तान के कब्जे वाले हिस्से में छिपे उस ISI मुख्यालय को ध्वस्त करना जो पिछले कई वर्षों से भारत के अंदरूनी इलाकों में आतंक की जड़ बना हुआ था।


लेकिन ये केवल एक युद्ध नहीं था… ये बदला था… उन 48 निर्दोष बच्चों का जो पुलवामा जैसी एक और साजिश में मारे गए थे। इस बार भारत ने सिर्फ़ जवाब नहीं, हिसाब तय कर लिया था।





दिल्ली - प्रधानमंत्री कार्यालय


प्रधानमंत्री श्रीमान विनोद सिंह की आँखें रात के दो बजे भी मॉनिटर पर टिकी थीं। सामने लाइव फीड में वज्र 9 की लोकेशन और सेट किए गए कोड दिखाई दे रहे थे।


"हम आज युद्ध नहीं चाहते," उन्होंने कहा, "लेकिन अगर हमारी चुप्पी को हमारी कमजोरी समझा गया, तो इतिहास गवाह रहेगा कि हमने अपने शहीदों की मिट्टी का कर्ज़ कैसे चुकाया।"





पाकिस्तान - इस्लामाबाद, ISI मुख्यालय


ISI प्रमुख जनरल शाकिर मेहदी को जैसे किसी बुरे स्वप्न का आभास हो रहा था। उन्हें सूचना मिली थी कि LOC के पास भारतीय सेनाएँ गुप्त रूप से भारी हलचल कर रही हैं। मगर वह हँस पड़ा।


"ये हिंदुस्तानी सिर्फ़ भाषण देते हैं… गोली नहीं चलाते।"


उसे नहीं पता था, इस बार गोली नहीं, तूफान आने वाला है।




सीमा पर युद्ध की पहली चिंगारी


अगली सुबह ठीक चार बजे LOC के पार एक धमाका हुआ — भारतीय वायुसेना के तेजस फाइटर जेट्स ने पहले ही चरण में पाकिस्तानी बंकरों पर हमला कर दिया था। एक के बाद एक गड़गड़ाहट, और देखते ही देखते पाकिस्तान के कई ठिकाने राख में बदल चुके थे।


इसी के साथ ज़मीनी हमला भी शुरू हो चुका था। अर्णव राठी की यूनिट दुश्मन की रेखाओं को पार कर चुकी थी।

"हम हर सैनिक नहीं हैं, हम देश के ज़िंदा जज़्बात हैं," अर्णव ने कहा।


उनके साथ थे –

कैप्टन महक सिंह, जिनके भाई 2001 के संसद हमले में शहीद हुए थे।

लेफ्टिनेंट कबीर नाज़, मुस्लिम होने के बावजूद देशभक्ति उनके खून में थी।

राइफलमैन वीर सावरकर, जिनका नाम ही उनकी परंपरा था।




युद्ध का निर्णायक मोड़


पांच दिन तक लड़ाई चली — आसमान से लेकर ज़मीन तक, बंकर से लेकर बर्फ़ की खाई तक। पाकिस्तान की सेना पीछे हट रही थी, उनके रेडियो सिग्नल से साफ़ था — “हम हार रहे हैं… भारत ने हमारी नसें काट दी हैं…”


और तभी आया "शून्य ऑपरेशन" का अंतिम चरण।


वज्र 9 ने इस्लामाबाद के पास स्थित एक गुप्त ISI लैब को खोज निकाला — जहाँ पाकिस्तान चीन और तुर्की के साथ मिलकर जैविक हथियार तैयार कर रहा था।

इस खबर के आते ही भारत ने संयुक्त राष्ट्र को सूचना दी, मगर कार्रवाई पहले ही शुरू हो चुकी थी।


10 मिनट का समय।

6 कमांडो।

1 मिशन — भारत की रक्षा।


बम सेट किया गया, और सभी कमांडो बाहर की ओर भागे। आखिरी छलांग लगाने से पहले अर्णव ने मुड़कर ISI की इमारत को देखा, जो अब एक आग का गोला बन चुकी थी।





इस्लामाबाद में मातम और नई सुबह


पाकिस्तान की संसद में सन्नाटा था। जनरल शाकिर ने इस्तीफ़ा दे दिया था। और सड़कों पर आम नागरिक पूछ रहे थे —

"हमें क्या मिला आतंक से? सिर्फ़ शर्म और हार।"


लाहौर में कई युवा भारत की जीत के समर्थन में बोल रहे थे — “हमें अपने फौज नहीं, शांति चाहिए।”





नई दिल्ली — विजय समारोह


तीन दिन बाद इंडिया गेट पर लाखों लोगों की भीड़ इकट्ठा थी।

"शून्य ऑपरेशन" के नायक अर्णव राठी और उनके साथी जब मंच पर आए, पूरा देश उनकी जयजयकार कर उठा।


प्रधानमंत्री ने कहा,

"हमने किसी देश को हराया नहीं… हमने आतंक की जड़ को काटा है। और जब तक भारत के बेटे-बेटियाँ जाग रहे हैं, तब तक कोई भी आँख भारत की ओर बुरी नज़र से नहीं देख पाएगी।"





कहानी का अंतिम दृश्य


कहानी के अंतिम फ्रेम में अर्णव बर्फ़ पर खड़ा है, हाथ में तिरंगा थामे हुए।

आसमान में सूरज उग चुका है।

और नीचे लिखा है 

“शांति माँगने वालों के लिए भारत हमेशा तैयार है…

मगर ललकारने वालों के लिए हम आग हैं।”