Sritunjay World: अज्ञात पथ की ओर रहस्य की परतें

अज्ञात पथ की ओर रहस्य की परतें

हवेली की बत्तियाँ बुझ चुकी थीं। कमरे की दीवारों पर टंगी घड़ियाँ एक ही समय पर रुक चुकी थीं — ठीक रात के तीन बजकर तैंतीस मिनट पर। हवेली की हवा ठंडी नहीं, बल्कि भारी लग रही थी… जैसे हर दीवार कुछ कह रही हो।

आप, जो ये कहानी पढ़ रहे हैं, कल्पना कीजिए कि आप भी उन चारों के साथ उसी हवेली में मौजूद हैं। सीढ़ियों के हर कदम पर आपकी साँसें थमती हैं, और हर कोने से किसी की निगाहें महसूस होती हैं। आप अब इस रहस्य का हिस्सा बन चुके हैं।


लक्ष्मी कुमारी अपने कमरे से बाहर निकली। उसके हाथ में अब भी वह लिफाफा था जिसमें लिखा था — “सत्य को स्वीकारना सबसे कठिन होता है।”
उसे हवेली के भीतर एक पुराना कमरा दिखा — उसमें दर्जनों अखबारों की कतरनें दीवारों पर चिपकी थीं। हर कतरन में एक ही बात थी —
“तीन गाँव, तीन गायबियाँ, एक समान तरीका। पुलिस अब तक असफल।”
लक्ष्मी के चेहरे का रंग उड़ गया। ये तीनों गाँव — सोनपुर, भौरकला, और नावलगढ़ — वही थे, जहाँ से वो, राहुल और राणा आए थे।


राहुल सिंह एक अंधेरे गलियारे में पहुँचा जहाँ उसकी आँखों के सामने एक वीडियो प्रोजेक्टर चल रहा था। वीडियो में एक बच्चा रो रहा था, और कह रहा था, “पापा कहाँ चले गए? कोई मेरी मदद क्यों नहीं करता?”
अचानक वीडियो बंद हुआ, और दीवार पर कुछ शब्द उभर आए:
“कभी-कभी तुम्हारा अतीत ही तुम्हें सबसे बड़ा धोखा देता है।”
राहुल को याद आया — उसके पिता कभी एक व्यापारी के लिए काम करते थे… उनका अचानक लापता हो जाना एक पहेली बन गया था।


राणा प्रताप, वर्दी पहने होने के बावजूद डरा हुआ था। उसने हवेली की ऊपरी मंज़िल के एक कमरे में प्रवेश किया। वहाँ एक पुराना फाइल केस खुला पड़ा था। उसमें उसके ही दस्तख़त थे — पर जिस अपराध पर, वह उसने कभी देखा नहीं था।
फाइल पर आखिरी लाइन थी —
“झूठ की नींव पर बनी वर्दी, कभी न्याय नहीं दिला सकती।”


और अब बारी थी सुनील राठौर की। वह कमरे में बंद था। अचानक उसकी घड़ी बंद हो गई, मोबाइल नो सिग्नल दिखाने लगा, और दरवाज़ा… अपने आप खुल गया। बाहर निकला, तो देखा — हवेली के सामने खड़ा एक बच्चा, जो बिल्कुल वैसा ही था जैसा राहुल के वीडियो में था।

बच्चे ने सुनील से पूछा, “क्या आपने ही मेरे पापा को भेजा था इस हवेली में?”
सुनील घबरा गया — उसके चेहरे पर पहली बार भय साफ़ था।
“तुम… कौन हो?”
बच्चा मुस्कराया — “जो तुम छिपाना चाहते हो, वही मैं हूँ।”


चारों अब हवेली के हॉल में पहुँच चुके थे — जहाँ फर्श पर एक विशाल नक़्शा उभर आया था। नक़्शे पर सिर्फ तीन गाँव और एक चिह्न दिख रहा था — त्रिकोण। और उस त्रिकोण के बीचोंबीच लिखा था —
“वापसी सिर्फ एक के लिए होगी।”


अब सवाल यह है,
क्या इन चारों में से कोई एक झूठ बोल रहा है?
क्या सुनील का अतीत इन तीनों को फँसाने के लिए जुड़ा था?
या फिर, तीनों को इस हवेली तक लाने वाला कोई और है?

और आप…
हाँ, आप।
अगर आप वहाँ होते, तो किस पर भरोसा करते?
लक्ष्मी पर, जिसकी आँखें सच्चाई छिपा नहीं सकतीं…
राहुल पर, जिसके दिल में डर से ज़्यादा सवाल हैं…
राणा पर, जिसकी वर्दी झूठ से भारी हो चुकी है…
या सुनील पर, जो अब तक मुस्कुराता रहा है — पर अब उसका चेहरा सफेद हो चुका है ?