"छह गाँवों की शापित सरहद"
हर तरफ कोहरा था।
ठंडी हवाओं में कुछ ऐसा था जो रगों में खून की जगह सिहरन दौड़ा दे।
छह गाँव — कालवन, भीरपुर, नरगाम, शिवटी, देवलिया और तलवाड़ा — कभी आपस में इतने जुड़े थे कि एक गाँव का दुख, सबका दुख बन जाता था। लेकिन सत्तर साल पहले कुछ ऐसा हुआ कि इन गाँवों के बीच नफरत, खामोशी और एक शाप की दीवार खड़ी हो गई।
आज तक कोई नहीं जान पाया कि वो रात कैसी थी।
पर वो दिन सबको याद है जब तलवाड़ा के कुएं से एक साथ छह बच्चों की लाशें मिली थीं। उन बच्चों का चेहरा पहचान से परे था और उनकी आँखें... खुली थीं। ऐसा लगता था जैसे मरने से पहले उन्होंने कुछ देखा हो — ऐसा कुछ जो इंसान के देखने लायक नहीं।
रमेश, एक शोधकर्ता और गाँवों के इतिहास का गहरा जानकार, उसी रहस्य को समझना चाहता था।
राहुल, उसका दोस्त और एक वीडियोग्राफर, बस इस सबको कैमरे में कैद करना चाहता था — एक डॉक्यूमेंट्री बनाने के लिए।
और रागिनी, एक मनोवैज्ञानिक, जो इस बात को मानने लगी थी कि शायद इंसानी दिमाग से परे भी कोई शक्ति है।
तीनों ने तय किया कि वे गाँवों की यात्रा करेंगे — एक-एक करके सभी छह गाँव।
पहला गाँव: कालवन
कालवन — जहाँ की हवाओं में भी मातम था।
रमेश ने गाँव के बुज़ुर्ग बाबा हीरालाल से मिलने की कोशिश की, मगर वो बोले भी नहीं। सिर्फ एक बात कही:
“सुनो... जब वो गाना शुरू हो, तो आँखें मत खोलना... वरना वो तुम्हें पहचान लेगी।”
उसी रात, जब तीनों मंदिर के पास ठहरे हुए थे, अचानक एक मीठा-सा गीत हवाओं में तैरने लगा। आवाज़ इतनी मोहक कि राहुल की आँखें अपने आप खुल गईं।
राहुल चीख पड़ा।
उसने कहा, “मैंने एक औरत को देखा… उसका चेहरा नहीं था… बस गहरा साया, और उसकी आँखें उल्टी थीं। वो मुझे देख रही थी।”
दूसरा गाँव: भीरपुर
भीरपुर की मिट्टी लाल थी — खून जैसी।
यहाँ की रातें हमेशा काली होती थीं, चाहे चाँद कितना भी चमके। गाँव के बीचोबीच एक टूटा घर था, जिसे लोग "मृत आशियाना" कहते थे।
रमेश ने वहाँ की ज़मीन खोदी — और अंदर से एक लकड़ी की गुड़िया मिली।
गुड़िया के अंदर से रागिनी को एक आवाज़ सुनाई दी — “तुम आ गए... अब हमें भी आज़ादी चाहिए।”
उसी रात रागिनी बेहोश मिली — उसकी हथेली पर किसी ने नाखून से खरोंच कर लिखा था —
"तीनों को लाना… वरना तुमसे शुरू करेंगे।"
तीसरा गाँव: नरगाम
नरगाम में न कुएँ थे, न पानी, न ही लोग।
बस एक वीरान स्कूल था, जिसमें किसी ज़माने में बच्चे पढ़ते थे। आज वहाँ सिर्फ दीवारों पर खून से बने चित्र थे —
तीन लोग... और एक छाया जो उन्हें निगल रही थी।
राहुल को वहाँ एक कैमरा मिला, जो खुद-ब-खुद चालू हो गया। उसमें एक वीडियो चला —
तीनों की ही जैसी परछाइयाँ थीं, पर वो चीख रही थीं। एक आवाज़ गूंज रही थी —
"तुम जैसे और भी आए थे... लेकिन अब उनकी रूह यहीं बसती है..."
चौथा गाँव: शिवटी
शिवटी एक श्मशान पर बसा गाँव था।
यहाँ दिन में भी चिताएँ जलती थीं — बिना किसी की मौजूदगी के।
तीनों ने देखा — एक चिता खुद-ब-खुद जल रही थी। उसपर कोई नहीं था, पर राख उड़कर रागिनी के चेहरे पर आ गिरी।
उस रात, रागिनी नींद में चलने लगी। उसकी आँखें खुली थीं, मगर वो कुछ देख नहीं रही थी। वो बस बुदबुदा रही थी:
“मैं जानती हूँ तुम कौन हो... तुम हमें मुक्ति नहीं दोगे... तुम हमें भोगना चाहते हो...”
पाँचवाँ गाँव: देवलिया
देवलिया गाँव पूरी तरह जला हुआ था।
हर घर की दीवारें काली, और वहाँ से निकलने वाली बदबू इतनी गंदी कि सांस लेना मुश्किल था।
रमेश ने नोटिस किया कि हर घर के बाहर किसी ने सफेद रंग से तीन गोले बना रखे थे। वह समझा — ये प्रतीक हैं तीन आत्माओं के…
और तभी एक बूढ़ी औरत झाड़ी से निकली, काँपते हुए बोली:
“तुम वही हो ना?... जिस दिन वो वापस आएँगे, तुम्हारा रक्त पीकर गाँवों को जिंदा करेंगे…”
छठवाँ गाँव: तलवाड़ा
आखिरी गाँव। वहीं जहाँ सत्तर साल पहले वो छह बच्चे मरे थे।
कुएँ के पास एक छाया खड़ी थी — स्याह, ठंडी और खामोश।
रमेश ने साहस करके पूछा: “तुम कौन हो?”
और आवाज़ आई:
"हम वही हैं... जिनके नाम मिटा दिए गए, पर आत्मा नहीं मिटी..."
फिर वो छाया तीन हिस्सों में बँट गई — तीन औरतों की परछाइयाँ, जिनके चेहरे इंसानी नहीं थे।
उन्होंने कहा:
“अब तीन और आत्माएँ हमारे साथ जुड़ेंगी… रमेश, राहुल, रागिनी… अब तुम लौट नहीं सकते…”
अंत... या शुरुआत?
कहते हैं उसके बाद कोई उन्हें नहीं देख पाया।
पर कई बार रात के समय छह गाँवों के बीच के रास्ते में किसी को कैमरा गिरा हुआ मिलता है,
कभी किसी की डायरी...
और कभी तीन परछाइयाँ — जो रास्ता रोकती नहीं, बस घूरती हैं...
जैसे अगली आत्मा की तलाश में हों।

