Sritunjay World: गुमशुदा परछाइयाँ

गुमशुदा परछाइयाँ

गुमशुदा परछाइयाँ


हर इंसान की ज़िन्दगी में कुछ फैसले ऐसे होते हैं जो उसकी पूरी दुनिया बदल देते हैं।
कुछ फैसले सोच-समझ कर लिए जाते हैं... और कुछ, बस अचानक ले लिए जाते हैं।
रामू, विकास और शिवानी – तीन नाम, तीन कहानियाँ, लेकिन एक रहस्य... जो उन तीनों को एक साथ भयाड़ी वन की ओर ले गया – एक ऐसी जगह जहाँ से कोई लौटकर नहीं आया।

रामू, जो धनपुर गाँव का सीधा-सादा लड़का था, खेतों के बीच पला-बढ़ा।

विकास, रतनगढ़ का तेज़-तर्रार लड़का था, जिसे हर चीज़ में रोमांच चाहिए था।
शिवानी, बसेड़ी की रहने वाली – शांत, समझदार और थोड़ा डरपोक भी।

तीनों शहर में मिले थे, पढ़ाई करते-करते उनकी दोस्ती इतनी गहरी हो गई थी कि अलग-अलग गांवों से होने के बावजूद, एक-दूसरे के बिना अधूरे से लगते।

कॉलेज की गर्मी की छुट्टियाँ चल रही थीं। एक दिन विकास ने अपने खास अंदाज़ में कहा,
"कभी सोचा है कि अगर हम कुछ ऐसा करें जो किसी ने कभी ना किया हो?"

रामू ने चुटकी ली, "मतलब आसमान से तारे तोड़ लाएं?"

शिवानी ने हल्के से मुस्कराते हुए कहा, "मुझे तो बस सही-सलामत घर लौटना है, तारे बाद में तोड़ लेना।"

विकास ने एक पुराना नक्शा फैलाया, जिस पर एक जगह लाल घेरे में थी – भयाड़ी वन
"ये देखो... ये जगह अभी तक अनएक्सप्लोर्ड है। बस कुछ लोककथाएँ हैं यहाँ के बारे में। कुछ लोग गए... पर लौटे नहीं।"


शिवानी का चेहरा स्याह पड़ गया, लेकिन रामू ने सिर हिला दिया।

"तो चलें?" विकास ने मुस्कराकर पूछा।

तीनों ने तय किया — इस बार गर्मी की छुट्टी यादगार होगी।


यात्रा की शुरुआत

धनपुर, रतनगढ़ और बसेड़ी से निकलकर वे तय समय पर जंगल के किनारे मिले।

भयाड़ी वन कोई आम जंगल नहीं था – वहाँ जाने वाले अक्सर रास्ता भूल जाते, या वापस ही नहीं आते।
पेड़ इतने घने थे कि सूरज की रौशनी तक ज़मीन तक नहीं पहुँचती थी। हर तरफ अजीब चुप्पी थी, मानो हवा भी साँसें रोककर खड़ी हो।